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विशाल बृहस्पति

by CKadmin

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाये तो बृहस्पति ग्रह सौरमंडल का सबसे बड़ा ग्रह हैं। ज्योतिष के अनुसार बृहस्पति देव को देवता के रूप में देखा जाता हैं। बृहस्पति देव को शील और धर्म का अवतार माना जाता हैं।

पुराणों के अनुसार ब्रह्मा जी के मानस पुत्र अंगिरा ऋषि का विवाह स्मृति से हुआ था। जिनके दो पुत्र हुए उतथ्य और जीव। जीव बचपन से ही शांत स्वभाव का था। उसने समस्त शास्त्रों तथा नीतियों का अध्ययन बचपन में ही कर लिए था। जीव ने भगवान शिव की घोर तपस्या की, जिस से प्रसन्न हो कर भगवान शिव ने जीव को बृहस्पति का नाम दिया और बोला कि तुम देवताओं के गुरु बनो और उनको धर्म व नीति का मार्गदर्शन करो। बृहस्पति देव की तीन पत्नियां थी – पहली पत्नी शुभा से सात कन्यायें हुई, दूसरी पत्नी तारा से सात पुत्र तथा एक कन्या हुई और तीसरी पत्नी ममता से दो पुत्र प्राप्त हुए।

बृहस्पति देव, धनु और मीन राशि के स्वामी हैं। बृहस्पति देव कर्क राशि में उच्च व मकर राशि में नीच का प्रभाव देते हैं। नक्षत्रों में पुनर्वसु, विशाखा और पूर्वा भाद्रपद बृहस्पति देव का अधिकार हैं। इनका तत्व आकाश, दिशा में पूर्व दिशा पर अधिकार है और ऋतु में शीत ऋतु से सम्बन्ध है।

बृहस्पति देव को पीला रंग, सोना, पुखराज, हल्दी की गाँठ, केसर, चने की दाल, घर के बुजुर्ग, पीपल का पेड़, स्कूल, टीचर, पुजारी, बेसन, मंदिर, मुर्गा, हवा, गर्दन, बब्बर शेर आदि का कारक माना जाता है।

बृहस्पति देव के शुभ होने पर व्यक्ति को सुख, धन, लम्बी आयु, शिक्षा, संतान, अच्छी किस्मत, बुद्धि प्रदान होती है।

अगर कुंडली में बृहस्पति देव अशुभ फल दे रहे हो तो हमेशा शुद्ध आचरण रखें, गुरु का आदर करें, सोना धारण करें, पीला धागा पहनें, बड़े-बुजुर्गों की सेवा करें, केसर का तिलक लगायें, पीले वस्त्र पहने, केला मंदिर में दान करें, गुरुवार का व्रत करें। किसी अच्छे ज्योतिष से परामर्श ले कर पुखराज पहना जा सकता है।

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