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कुंडली के बारह भावों से जुड़े शरीर अंग व रोग

by CKadmin

जिस गति से मानव ने तकनीकी व औद्योगिक स्तर पर विकास किया है वैसे वैसे उसने स्वयं के सामने बहुत सी समस्याओं को भी जन्म दिया है। जिनमें से आज चरम पर है स्वास्थ्य सम्बंधी समस्याएं। आज ना जाने कौन कौन से व कैसे कैसे रोगों का विकास हो चुका है। जिनमें से माईग्रेन, रक्तचाप, टी बी, कैंसर, ह्वदय रोग, दमा, डायबिटीज, त्वचा विकार, नेत्र रोग, आदि मुख्य रूप से घातक हैं। इनके अलावा भी ऐसे बहुत से रोग हैं जिनका चिकित्सा पद्धति के पास अभी तक कोई उपचार उपलब्ध नहीं है। यदि हम ज्योतिष शास्त्र में चिकित्सा की बात करें तो इस पर कोई बहुत बड़ा शोध कार्य तो नहीं हुआ है परन्तु राशियों, ग्रहों, नक्षत्रों व कुंडली के भावों का सम्पूर्ण आंकलन करके जातक को होने वाले रोग, उसके समय, उसकी गम्भीरता का पता लगाया जा सकता है। कुंडली का लग्नभाव जातक के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण होता है। कुण्डली में षष्टम भाव बीमारी देता है व अष्टम भाव बीमारी को और गम्भीर बना देता है, वहीं कुंडली का द्वादश भाव बीमारी के इलाज पर होने वाले खर्चें को दर्शाता है।
जातक की कुंडली का प्रत्येक भाव उसके शरीर के कुछ विशेष अंगों का प्रतिनिधित्व करता है, जिसके दोषपूर्ण होने पर जातक को उस भाव के कारक अंगो से सम्बंधित रोगों व उसकी पीड़ा को भोगना पड़ता है।
प्रथम भाव –इस भाव से जातक के सम्पूर्ण स्वास्थ्य का ज्ञान भी होता है। पहले भाव से मानसिक रोग, मस्तिष्क सम्बन्धी विकार जैसे सिर दर्द, माइग्रेन, कोई गहरी चोट, यादाश्त की कमजोरी आदि।
दूसरा भाव – इस भाव से मुख्यतः मुख व गले से सम्बंधी अंगों का विश्लेषण किया जाता है। मुँह, आंख, नाक, कान, दाँत आदि इसी भाव से दर्शाए जाते हैं।
तीसरा भाव – तीसरे भाव से गले, श्वांस नली, खाद्य नलिका, आदि का विचार किया जाता है। यहीं से दमा, खाँसी आदि गले से जुड़े रोगों की गणना होती है। कुंडली के तृतीय भाव से जातक की बाजू व हाथ को भी देखा जाता है.
चौथा भाव – इस भाव से छाती के हिस्से को दर्शाया जाता है। हृदयरोग व फेफडों के रोगों का विचार कुंडली के चौथे भाव से किया जाता है.
पांचवाँ भाव – कुंडली का यह भाव छाती से नीचे पेट को दर्शाता है। अतः पेट व पाचन क्रिया से सम्बंधित रोगों का विचार यहाँ से किया जाता है। यह भाव पित्त की थैली, लीवर, किडनी आदि से सम्बंधित होता है।
छठा भाव – इस भाव से पेट के नीचे नाभि का हिस्सा देखा जाता है जहाँ मुख्य रूप से आँते व कमर की हिस्सा आता है। अतः इन स्थानों से जुड़े रोगों को इस भाव से देखा जाता है। अपेन्डिक्स भी हमारी बड़ी आंत का ही एक हिस्सा है।
सातवाँ भाव – इस भाव मुख्यतः गुप्तांग सम्बन्धी रोगों को देखा जाता है। पथरी, गर्भाशय के रोग, योनि सम्बन्धी विकार, बवासीर आदि रोगों का विचार इस भाव से किया जाता है.
आठवाँ भाव – कुंडली के अष्टम भाव से स्त्री व पुरुष के जननांगों को देखा जाता है। अतः यहाँ से जनेन्द्रिय से जुड़े रोगो के विषय में जानकारी होती है। पुरुष में वीर्य-विकार, शीघ्रपत्न, मूत्र विकार, अंडाणु व शुक्राणुओं का पूर्ण रूप से विकसित न होना, भगंदर, प्रोस्ट्रेट ग्रन्थी जैसे रोगों के लिए भी अष्टम भाव को देखा जाता है।
नवम भाव – जातक की कुंडली के नवम भाव से विशेष रूप से गुप्तांग के नीचे का हिस्सा व अस्थिमज्जा को दर्शाया जाता है। अतः रक्त सम्बन्धी विकारों के लिए इसी भाव को देखा जाता है। कुछ मतो के अनुसार स्त्रियों में मासिक धर्म से जुड़ी समस्याएं भी नवम भाव से देखी जारी हैं।
दशम भाव – कुंडली के दशम भाव से जातक के शरीर के घुटनों के आस पास के अंगों को देखा जाता है। गठिया, घुटने का दर्द, अर्थराइटिस आदि रोगों का विश्लेषण दशम भाव से किया जाता है।
एकादश भाव – एकादश भाव जातक के घुटने के नीचे का हिस्सा दर्शाया जाता है। अतः इस भाव से पैरों में होने वाले विकार जैसे पैरों में दर्द होना, टखने व पिण्डलियों पर चोट लगना आदि को देखा जाता है।
बारहवाँ भाव – कुंडली के द्वादश भाव से बाईं आँख के विकार, शरीर में रोगों से लड़ने के लिए प्रतिरोधक क्षमता का विचार किया जाता है.


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