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सुनफा योग

by CKadmin

जातक को राजातुल्य जीवन सुख देता है कुंडली में सुनफा योग:

जब दो या दो से अधिक ग्रह जातक की कुंडली में परस्पर एक विशेष स्थिती में उपस्थित होते हैं तो ज्योतिषशास्त्र की परिभाषा में कुंडली में एक योग का निर्माण होता है। परन्तु हर योग सुयोग ही हो ऐसा जरूरी नहीं है। बहुत बार विपरीत स्वभाव के ग्रहों के परस्पर मिलने से दुर्योग भी बनते हैं।

कुंडली में बनने वाले ऐसे ही अनेकों प्रकार के योगों में से एक है चंद्र ग्रह से बनने वाला अति शुभ योग सुनफा योग। चंद्र ग्रह से बनने वाले योगों को महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि चन्द्रमा की गति सबसे अधिक है। यह सौरमण्डल में पृथ्वी के चारों ओर परिक्रमा करते हुए जातक की कुंडली में 27 नक्षत्रों को भोगते हुए 12 राशियों के चक्र को एक महीने में पूरा कर लेता है। अतः जातक को सर्वाधिक प्रभावित करता है।

ज्योतिषशास्त्र की परिभाषा के अनुसार यदि लग्न कुंडली में कोई ग्रह चन्द्रमा से द्वितीय भाव में उपस्थित हो तो सुनफा योग का निर्माण होता है। परंतु इस योग के निर्माण में सूर्य, राहू व केतू ग्रह अपवाद है। यदि इन तीनों में से कोई ग्रह चंद्रमा से द्वितीय भाव में हो तो उसे सुनफा योग नहीं मानेंगें। परंतु ऐसा बहुत बार देखने व सुनने में आता है कि किसी जातक की कुंडली में सुनफा योग तो है किंतु उसे उसके शुभ फल प्राप्त नहीं होते। यहाँ यह बात समझने योग्य है कि किसी योग के फलिभूत होने में योग के कारक ग्रहों का बली होकर कुंडली में उपस्थित होना आवश्यक होता है। अतः सुनफा योग के शुभ फलों की प्राप्ति जातक को तभी होती है यदि कुंडली में चंद्रमा व अन्य योग कारक ग्रह किसी और ग्रह की दृष्टि के दुष्प्रभाव में न हों। योग कारक ग्रहों के साथ कोई क्रूर या अशुभ ग्रह स्थित न हो। योगकारक ग्रहों के बलाबल में कमी होने से योग कमजोर हो जाता है। अतः पूर्णरूप से शुद्ध व बली सुनफा योग जातक को राजातुल्य जीवन प्रदान करता है। वह धन-धान्य से सम्पन्न जीवन व्यतीत करता है। जातक ज्ञानवान व बुद्धिमान होता है। वह हर प्रकार की परिस्थितियों का डटकर सामना करने वाला होता है। जातक घर व समाज में मान सम्मान पाता है।

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