Home आध्यात्म जाने कैसे मिला माँ गंगा को भगवान शिव की जटाओं में स्थान

जाने कैसे मिला माँ गंगा को भगवान शिव की जटाओं में स्थान

by CKadmin

श्रीमद भागवत की एक कथा के अनुसार एक बार राजा सगर जो कि इक्षवाकु वंश व भगवान राम के पूर्वज थे उन्होंने घोड़े की बलि देने का फैसला किया। परंतु उनके इस कार्य से स्वर्ग के राजा इंद्र को ईर्ष्या हुई, और उन्होंने राजा सगर के घोड़े को चुराकर ऋषि मुनि कपिलदेव के आश्रम में ले जाकर बांध दिया। जब राजा सगर को इस बात का मालूम पड़ा तो उन्होंने घोड़े की खोज में अपने सभी पुत्रों को भेज दिया। घोड़े की तलाश में निकले राजा सगर के पुत्र कपिल देव मुनि के आश्रम में पहुंचे और घोड़े को वहाँ बंधा हुआ पाकर मुनि कपिल को दोषी मानते हुए उनके आश्रम पर आक्रमण कर दिया। क्रोध में आकर ऋषि कपिल ने राजा सगर के सभी पुत्रों को जलाकर भस्म कर दिया। राजा सगर के पुत्र राजा अंशुमन ने कपिल ऋषि से उनका क्रोध शांत कर अपने पूर्वजों के उद्धार की भिक्षा का आग्रह किया। राजा अंशुमन के आग्रह पर ऋषि कपिल ने बताया कि उसके पूर्वजों का उद्धार केवल गंगा नदी के पवित्र जल से ही हो पाएगा। राजा अंशुमन व उनके बाद उनके पुत्र दिलीप ने गंगा को भूलोक पर लाने के लिए घोर तपस्या की परन्तु असफल रहे। इसके बाद राजा दिलीप के पुत्र भागीरथ ने गंगा को पृथ्वी पर लाने का संकल्प लिया। राजा भगीरथ अपना राजपाट पुत्र के अभाव के कारण अपने मंत्रियों को सौंप कर कठिन तपस्या के लिए निकल गए। भागीरथ की तपस्या से खुश होकर माँ गंगा ने उन्हें मनोवांछित वर दिया और उनके साथ पृथ्वी पर चलने के लिए तैयार हो गई। परन्तु माँ गंगा ने भागीरथ से कहा पृथ्वी का तल मेरे पवित्र जल का बोझ सहन नहीं कर पाएगा। इसके लिए तुम्हें भगवान शिव की आराधना करनी होगी। भागीरथ ने तब एक पैर पर खड़े होकर कई वर्षों तक भगवान शिव को प्रसन्न करने हेतू घोर तपस्या की। भगवान शिव ने भागीरथ से प्रसन्न होकर उसकी मदद करने का वचन दिया। गंगा नदी को यह भ्रम था कि भगवान शिव उसके जल का भार नहीं सहन कर पाएंगे और पाताल में चले जाएंगे। गंगा के इस भ्रम को तोड़ने के लिए भगवान ने गंगा को अपनी जटाओं में इस प्रकार फंसा लिया कि गंगा को कई वर्षो के बाद भी भगवान की जटाओं से बाहर निकलने का मार्ग नहीं मिला। तब गंगा ने भगवान शिव से क्षमा मांगी और भगीरथ के साथ धरती पर जाने के लिए तैयार हुई।

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