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क्रूर नहीं वास्तव में न्याय के देवता हैं कर्मफलदाता शनि

by CKadmin

ज्योतिषशास्त्र में शनि ग्रह को एक अशुभ व क्रूर ग्रह की संज्ञा दी जाती है। शनि को कालपुरुष का दुख कहा जाता है। ज्योतिषशास्त्र में शनि को दुख, रोग, पीड़ा, लोहा, लकड़ी, पुरानी चीज़ें- कबाड़ी, खनिज तेल, चमड़ा, अँधेरा, सेवक, मजदूर वर्ग, नौकरी का कारक माना जाता है। मनुष्य के अंदर शनि की ढैय्या व साढ़े साति को लेकर भी बहुत भय बना रहता है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार शनि सूर्यदेव के पुत्र हैं व इन्हें देवताओं में गिना जाता है। सूर्य शनि में पिता पुत्र के रिश्ते के बाद भी ज्योतिष शास्त्र के अनुसार गहरी शत्रुता मानी जाती है। सभी ग्रहों में शनि की गति सबसे कम है, अतः इनका एक राशि में गोचर ढाई वर्ष का होता है। उपरोक्त अवधारणाओं के आधार पर शनि को नकारात्मक दृष्टि से देखा जाता है। वास्तव में शनिदेव कर्मफलदाता होने के कारण जातक के सही व गलत हर प्रकार के कर्मों का परिणाम देकर न्याय को स्थापित करते हैं। आपकी अच्छाई व ईमानदारी से शनि की कृपादृष्टि आप पर बनी रहती है जबकि आपके बुरे कर्म आपको शनि की क्रूर व वक्री दृष्टि का ग्रास बना देते हैं। शनि एक विरक्त स्वभाव का ग्रह है। यह जातक में अंतर्मुखी प्रवर्ति का कारक बनता है। जिसके कारण व्यक्ति किसी के साथ ज्यादा मेलजोल स्थापित नहीं कर पाता। शनि ग्रह जातक को मेहनत व परिश्रम करने का संदेश देते हैं व उसे आत्मनिर्भर बनने की प्रेरणा प्रदान करते हैं। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार शनि मकर व कुंभ राशि का स्वामित्व रखते हैं। ये तुला राशि में उच्च व मेष राशि में नीच के होते हैं। शनि के पास तृतीय, सप्तमी व दसवीं दृष्टि होती है।

शनि देव को शांत करने के लिए करें निम्नलिखित उपाय:-

-ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः मंत्र का जप करें।

-शनिवार के दिन शनिदेव की प्रतिमा पर सरसों के तेल का दीपक जलाएं व अपनी भूल की क्षमायाचना करें।

-शनिवार के दिन नमक रहित व्रत रखें।

-किसी लोहे के पात्र में सरसों का तेल डालकर उसमें अपनी छाया देखें व इस तेल को दान करदें।

-हनुमान चालीसा का नित्य पाठ करें।

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