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विंशोत्तरी दशा: फलादेश की सटीक गणना

by CKadmin

भारतीय ज्योतिष शास्त्रों में कई प्रकार की दशा पद्धतियों का वर्णन आता है। इनमें सर्वाधिक मान्य व आसान है महर्षि पराशर द्वारा प्रतिपादित विंशोत्तरी दशा। इसमें मानव के जीवनकाल को 120वर्ष माना गया है। आज के संदर्भ में बात की जाए तो मनुष्य की आयु औसतन 70 से 80वर्ष रह गई है जो पृथ्वी लोक पर स्थान परिवर्तन के साथ भिन्न भिन्न मिलती है। अतः इस पर एक मत यह भी है कि विंशोत्तरी दशा की जितनी अवधि मनुष्य जीवित अवस्था में भोगता है उसकी शेष वह अपनी गर्भावस्था व मृत्यु के बाद भोगता है। इस दशा को कृतिका नक्षत्र से शुरू करके तीन की आवर्ति से सूर्य, चन्द्र, मंगल, राहू, बृहस्पति, शनि, बुध, केतू व शुक्र नवग्रह की श्रृंखला आती है। विंशोत्तरी दशा में सूर्य की दशा 6 वर्ष, चन्द्रमा की दशा 10 वर्ष, मंगल की दशा 7 वर्ष, राहू की दशा 18 वर्ष, बृहस्पति की दशा 16 वर्ष, शनि की दशा 19 वर्ष, बुध की दशा 17 वर्ष, केतू की दशा 7 वर्ष व शुक्र की दशा 20 वर्ष की होती है। अतः सब ग्रहों की दशाओं के कुल योग 120 वर्ष होता है। इस दशा का आरंभ कृतिका नक्षत्र से होता है। इस दशा से यह ज्ञात किया जाता है कि मनुष्य पर किस समय कौन से ग्रह का प्रभाव है। विंशोत्तरी दशा में ग्रहों की दशाएं कई-कई वर्षों तक चलती हैं अतः एक ग्रह की दशा में अन्य ग्रह के प्रभावों को उनकी अंतर्दशा, प्रत्यंतर दशा के द्वारा देखा जाता है। इस दशा पद्धति में एक ग्रह की दशा में अन्य ग्रहों की उपदशाओं का विवरण निम्नप्रकार है- विंशोत्तरी दशा-अंतर्दशा- प्रत्यंतर दशा – सूक्ष्म दशा – प्राण दशा – देह दशा।

विंशोत्तरी दशा चन्द्रमा के नक्षत्र पर आधारित है। जातक के जन्म के समय चन्द्रमा जिस नक्षत्र में प्रवेश करता है उस नक्षत्र के स्वामी ग्रह की महादशा से जातक का विंशोत्तरी दशा का चक्र आरम्भ होता है। उदाहरण के लिए यदि जातक का जन्म नक्षत्र अश्विनी है तो जातक को सर्वप्रथम केतू ग्रह की महादशा प्राप्त होगी। तथा उसके बाद उपरोक्त अनुसार शुक्र ग्रह की दशा, फिर सूर्य की आदि। यहाँ फलकथन के लिए महादशा व उपदशाओं के ग्रहों का जातक की कुंडली में आंकलन किया जाता है। शुभ व बली होकर बैठे ग्रह अपनी दशा काल में जातक को शुभ फल प्रदान करते हैं व अशुभ ग्रह अपने दशाकाल में जातक को बेकार फल देते हैं।

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